अब हवा से चार्ज होगी बैटरी! जानिए Sodium-Air Fuel Battery से कैसे मिलेगी 3 गुना ज्यादा पॉवर

दुनिया तेजी से इलेक्ट्रिक व्हीकल और सोलर एनर्जी की ओर बढ़ रही है, लेकिन इन दोनों की सबसे बड़ी कमजोरी एक ही है—बैटरी। ईवी चलाने वाले लोग रेंज और चार्जिंग टाइम से परेशान हैं, जबकि घरों में लगे सोलर सिस्टम रात में बैटरी बैकअप खत्म होने से। पांच दशकों से हम बैटरी संबंधी समस्याओं से लड़ रहे हैं, लेकिन अब MIT के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक दिखा दी है जो भविष्य बदल सकती है—Sodium-Air Fuel Cell

Sodium-Air Fuel Battery details

लिथियम की सीमाएं: क्यों ढूंढना पड़ा नया विकल्प?

लिथियम बैटरियों ने दुनिया बदल दी, लेकिन ये अब अपनी सीमा पर पहुँच चुकी हैं। लिथियम की सबसे बड़ी दिक्कत है कम पावर डेंसिटी—लगभग 300 Wh/kg है। इसकी वजह से ईवी में बड़ी बैटरी लगाने पर उसका वज़न बढ़ जाता है और माइलेज घट जाता है। ऊपर से चार्ज होने में घंटे लगते हैं।

घर में सोलर बैकअप चाहिए तो बहुत महंगा और बड़ा लिथियम बैंक लगाना पड़ता है, जो आम लोगों के बजट से बाहर है। दूसरी चुनौती है सेफ्टी। लिथियम-आयन बैटरियाँ गर्मी बढ़ने पर फट सकती हैं, आग पकड़ सकती हैं। तीसरी समस्या लिथियम एक दुर्लभ और महंगा मटेरियल है, जिसकी मोनोपोली चाइना के पास है। इससे भारत कभी पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं बन सकता।

सोडियम: मुफ्त, सुरक्षित और हर जगह उपलब्ध ऊर्जा का स्रोत

सोडियम पृथ्वी पर छठे नंबर पर सबसे ज्यादा उपलब्ध तत्व है। समुद्रों में यह असीमित मात्रा में पाया जाता है। MIT के वैज्ञानिकों ने इसी सोडियम को आधार बनाकर Sodium-Air Fuel Cell बनाया है जो लिथियम की तुलना में 3 गुना पावर डेंसिटी देता है, बेहद हल्का है, सस्ता है और पूरी तरह सुरक्षित है।
 

सबसे खास बात इसका कैथोड हवा से ऑक्सीजन खींचता है, यानी फ्यूल का आधा हिस्सा वातावरण से मिलता है। इससे बैटरी बेहद पावरफुल हो जाती है। और यह बैटरी नहीं, बल्कि एक ईंधन जैसा लिक्विड एनर्जी टैंक है, जिसे खत्म होने पर आप डीज़ल की तरह बदल सकते हैं। 5 मिनट में नया टैंक और फिर वाहन तैयार हो जायेगा!

यह तकनीक कैसे काम करती है?

MIT की फ्यूल सेल में एनोइड के रूप में 150°C पर पिघला हुआ सोडियम इस्तेमाल होता है। सोडियम इलेक्ट्रॉन छोड़कर आयन बनता है, वही इलेक्ट्रॉन बाहर के सर्किट में बहकर ईवी या घर के उपकरणों को बिजली देते हैं।
 

कैथोड वातावरण से ऑक्सीजन खींचकर सोडियम आयन के साथ प्रतिक्रिया करता है और हाई-एनर्जी आउटपुट देता है। बीच में एक सॉलिड इलेक्ट्रोलाइट लेयर होती है जो इसे सुरक्षित बनाती है। सबसे बड़ी बात यह लिथियम की तरह फटती नहीं, आग नहीं पकड़ती और इसकी सामग्री लगभग मुफ्त है।

क्या चुनौतियाँ हैं और कब तक आएगी यह तकनीक?

इतने फायदे होने के बाद भी ये तकनीक अभी मार्केट में नहीं आई, क्योंकि कुछ बड़े चैलेंज सामने हैं—

  1. 150°C तापमान को सुरक्षित तरीके से टैंक में बनाए रखना, ताकि बाहर से टैंक ठंडा रहे।
  2. उपयोग के बाद बनने वाले सोडियम ऑक्साइड को फिर से सोडियम में बदलने की रिसाइक्लिंग प्रक्रिया अभी महंगी और जटिल है।
  3. सोडियम के स्टोरेज व ट्रांसपोर्ट के लिए नए सेफ्टी स्टैंडर्ड और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए।

लेकिन याद रखिए 10 साल पहले लोग ईवी को मज़ाक समझते थे और आज हर कंपनी इलेक्ट्रिक कार बना रही है। ठीक यही बदलाव आने वाले वर्षों में Sodium-Air Fuel Cell भी ला सकता है।

भारत के लिए यह तकनीक सबसे बड़ी उम्मीद हो सकती है, क्योंकि हमारे पास सोडियम की कोई कमी नहीं है। अगर यह टेक्नोलॉजी सफल होती है, तो भारत ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में सबसे बड़ा कदम उठाएगा।

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