राजस्थान के सरकारी कॉलेजों में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। उच्च शिक्षा विभाग ने संविदा पर काम कर रहे शिक्षकों की जगह अब परीक्षा के जरिए नई भर्ती की तैयारी शुरू कर दी है। इस कदम से राज्यभर के कॉलेजों में पहले से कार्यरत करीब 2700 सहायक आचार्यों की नौकरी पर संकट खड़ा हो गया है। यह बदलाव राजसेस (RAJ-SHES) के तहत संचालित कॉलेजों में किया जा रहा है, जिससे शिक्षकों में भारी नाराज़गी देखी जा रही है।

पुराने शिक्षकों पर संकट, नए नियमों से बढ़ी बेचैनी
राजस्थान कॉलेज शिक्षा विभाग ने हाल ही में राजसेस हियरिंग ऑफ मैनपावर रूल्स 2023 में संशोधन किया है। इस संशोधन के तहत, अब कॉलेजों में संविदा शिक्षकों की नियुक्ति परीक्षा के जरिए की जाएगी। इसका मतलब यह है कि जो शिक्षक पिछले कई सालों से विद्या संबल योजना के तहत पढ़ा रहे थे, उन्हें अब फिर से नियुक्ति प्रक्रिया में हिस्सा लेना पड़ेगा — वरना उनकी नौकरी चली जाएगी।
विभाग की इस नई नीति के बाद कॉलेजों में कार्यरत 2700 विद्या संबल सहायक आचार्य खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। विद्या संबल सहायक आचार्य संघ के अध्यक्ष डॉ. रविंद्र सिंह यादव ने कहा है कि “यह संशोधन हमारे साथ अन्याय है। हम वर्षों से विद्यार्थियों को पढ़ा रहे हैं, ऐसे में अब परीक्षा के नाम पर हमें बाहर करना किसी सज़ा से कम नहीं।”
पांच साल की संविदा भर्ती का नया प्रावधान
सूत्रों के अनुसार, उच्च शिक्षा विभाग अब 374 राजसेस महाविद्यालयों और अन्य पदों पर केवल 5 साल के लिए संविदा भर्ती करने जा रहा है। यानी, नियुक्ति स्थायी नहीं होगी और हर पांच साल बाद शिक्षक को दोबारा प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। इससे शिक्षकों के भविष्य को लेकर अनिश्चितता और भी बढ़ गई है।
पहले विद्या संबल योजना के तहत कॉलेजों में विषय-वार अस्थायी शिक्षकों को पढ़ाने का अवसर दिया गया था। इस योजना ने हजारों शिक्षित युवाओं को रोजगार दिया था। लेकिन अब इस योजना के तहत लगे शिक्षकों को हटाकर परीक्षा आधारित संविदा भर्ती की प्रक्रिया ने पूरे शिक्षा तंत्र को हिला दिया है।
विरोध तेज, सरकार पर बढ़ा दबाव
इस फैसले के खिलाफ शिक्षकों ने विरोध शुरू कर दिया है। कई जिलों में शिक्षकों ने धरना-प्रदर्शन की तैयारी भी शुरू कर दी है। उनका कहना है कि विभाग का यह फैसला न केवल हजारों परिवारों को प्रभावित करेगा बल्कि कॉलेजों में शिक्षण व्यवस्था भी प्रभावित होगी।
वहीं, विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। क्योंकि अचानक की गई इस भर्ती नीति में पुराने अनुभवी शिक्षकों को बाहर करना शिक्षा की गुणवत्ता पर भी असर डाल सकता है।
राजस्थान की कॉलेज शिक्षा व्यवस्था में यह बदलाव आने वाले समय में बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बन सकता है। अब देखना यह है कि सरकार पुराने शिक्षकों की मांगें मानती है या नए भर्ती नियमों पर अडिग रहती है। फिलहाल, कॉलेजों में “नई भर्ती बनाम पुराने शिक्षक” की जंग शुरू हो चुकी है।
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